समय के साथ सिर्फ़ समय बदलता है।
कुछ ठीक होने के लिए समय नहीं, हमारा बदलना ज़रूरी होता है।
“समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।”
शायद इसलिए क्योंकि यह मान लेना आसान है कि हमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। बस थोड़ा और इंतज़ार करना है। कुछ दिन और। कुछ महीने और। फिर शायद सब अपने आप बदल जाएगा।
लेकिन समय की एक अजीब आदत है। वह किसी के लिए रुकता नहीं, और अपने साथ बदलाव की गारंटी भी नहीं लाता।
जो काम आज टाल रहे हो, वह कल भी वहीं पड़ा मिल सकता है। जिस फैसले से आज डर रहे हो, उससे डरने की वजह कल भी हो सकती है। जिस रिश्ते में आज बात नहीं हो रही, वहाँ सिर्फ़ दिन बीत जाने से संवाद वापस नहीं आता।
समय बीतता रहता है।
लेकिन हर बीतता हुआ दिन हमें बेहतर नहीं बनाता।
कभी-कभी वह सिर्फ़ हमारी उम्र बढ़ाता है और वही समस्या हमारे सामने रख देता है, जिसे हम इतने समय से टालते आ रहे थे।
हम कहते हैं—“अभी सही समय नहीं है।”
फिर वही बात कल कहते हैं।
फिर अगले हफ्ते।
फिर अगले महीने।
और एक दिन पीछे मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है कि सही समय का इंतज़ार करते-करते बहुत सारा समय निकल चुका है।
सच शायद यह है कि समय चीज़ों को अपने आप ठीक नहीं करता।
वह सिर्फ़ हमें मौका देता है।
बदलना हमें पड़ता है।
शुरुआत हमें करनी पड़ती है।
माफ़ी हमें माँगनी पड़ती है।
फैसला हमें लेना पड़ता है।
जिस काम से भाग रहे हैं, उसकी तरफ़ पहला कदम हमें ही बढ़ाना पड़ता है।
कभी-कभी हमें परिस्थितियाँ बदलने का इंतज़ार होता है, जबकि परिस्थितियाँ हमारे बदलने का इंतज़ार कर रही होती हैं।
एक ही जगह खड़े रहकर सिर्फ़ कैलेंडर बदलने से मंज़िल नहीं बदलती।
इसलिए शायद अगली बार जब मन कहे—“समय के साथ सब ठीक हो जाएगा,” तो एक सवाल और पूछना चाहिए:
“और अगर नहीं हुआ तो?”
शायद उस सवाल का जवाब ही शुरुआत है।
क्योंकि समय के साथ सिर्फ़ समय बदलता है।
बाकी कुछ बदलना हो,
तो हमें बदलना पड़ता है।
Lead Software Architect, Writer & Thinker exploring Technology, Science, Code, Ideas, and Words.
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